कालापादरी’’ एक अप्रतिम उपन्यास (आज के संदर्भ में)
संजु साहू1, डाॅ. रमेश अनुपम2
1शोध छात्रा , दू.ब स्वशासी महिला स्ना. महा. रायपुर (छ.ग.) (पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.) के अंतर्गत)
2शोध निर्देशक, दू.ब स्वशासी महिला स्ना. महा. रायपुर (छ.ग.) (पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ.ग.) के अंतर्गत)
सारांश
तेजिंदर के उपन्यास ‘‘कालापादरी‘‘ समकालीन हिन्दी साहित्य उपन्यास जगत में अपने आप में विलक्षण है। ‘‘काला पादरी’’ हिन्दी उपन्यास परम्परा से हटकर समाज की कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार व कुरूपता का चेहरा उजागर करने वाला बेजोड़ दस्तावेज है। ‘‘कालापादरी’’ में जेम्स खाका की अंतर्मन की संवेदनाओं को उपन्यासकार ने पूरी दक्षता से उभारा है। अंततः उपन्यास की तार्किक परिणिती जेम्स खाका के उस निर्णय में होती है जो उसे धर्म की चाकरी से मुक्त करता है और वह चर्च की संडे की प्रार्थना मेें शामिल होने के बजाए अपनी महिला मित्र सोंजेलिन मिंज के साथ बाजार जाने का निर्णय लेता है। ‘‘कालापादरी’’ की अंर्तवस्तु वर्तमान समय की अत्यंत संवेदनशील अंर्तवस्तु है इसमें व्यक्ति और समाज के भौतिक जीवन की संवेदनात्मक व मानवीय पहलू का सजग चित्रण है। निः संदेह कालापादरी के माध्यम से तेजिंदर ने उपन्यास जगत को गौरवन्वित किया है।
युग कोई भी क्यों ना हो उपन्यास सदैव ही समाज का स्पंदन रहा है। उसमें व्यक्ति, विचार, समाज की प्रथाए, परंपराएं चेतना का सजग चित्रण मिलता है। इस प्रकार वातावरण समाज परिवेश उपन्यासकार के चिंतन एवं उसके अनुभुतियों को प्रभावित करता है। ऐसी ही अभिव्यक्ति हमें तेजिंदर की अद्भुत कृति ‘‘कालापादरी’’ उपन्यास में देखने को मिलती है। तेजिंदर का यह उपन्यास मानव जीवन का जीवंत साक्ष्य है। सन् 2000 में आयी, तेजिंदर की इस उपन्यास में एक ऐसे सहित्यिक विषय को स्पर्श किया गया है जो अपने आप में किसी बीहड़ से कम नहीं है और उपन्यासकार की विशेषता ही जटिलता और बीहड़ता की ओर रूख करना है इस तरह भूखमरी जो इस अंचल में मुंह फाड़ के बैठी है को बड़ी ही संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है और एक प्रश्न दाग दिया गया है। कि भूख हमेशा दलित या आदिवासी की क्यों होती है ?
यह प्रश्न पाठको को विचलित कर देता है।
‘‘कालापादरी’’ विभिन्न आंचलिक समस्याओं के साथ जेम्श खाका का सोंजेलिन मिंज के प्रति सात्विक प्रेम को भी सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है। जिसमें नायक जेम्श खाका सोंजेलिन मिंज से कहता है कि सरगुजा एक तरह से काला यूरोफ है और तुम काली मेम साहब सोंजेलिन मिंज और जेम्श खाका के बीच की सर्वस्पर्शी भावनात्मक संवाद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां अनकही बाते ज्यादा अच्छी तरह से उभर कर आयी है या कह सकते है मौन भी अभव्यंजना है को चरितार्थ करती है।
सामाजिक प्रतिमानों के अदृश्य स्तंभो के साथ वातावरण व परिवेश का तेजिंदर ने अद्भुत व गजब समायोजन किया है।
सोंजेलिन का निःस्वार्थ प्रेम जो विपरीत परिस्थिति में भी अपने प्रेम का साथ नहीं छोड़ती है। धर्मान्तरण जैसे विषय व वातावरण में एक निश्छल प्रेम का स्फुटन जो धर्म, जाति, वर्ग समाज देश से परे है और अंततः प्रेम की जीत होती है।
‘‘कालापादरी’’ में जेम्श खाका को किस तरह से वहां की क्षेत्रिय राजनीति, चर्च की कार्यप्रणाली, बिसपस्वामी की अपनी नीतियों के समक्ष आना पड़ता है। जिसे उपन्यासकार ने बड़ी रोचकता से प्रस्तुत किया है जिससे क्षेत्रिय संवेदनशील मुद्दे स्वाभाविकता से आ गए है, जो नायक के साथ पाठकों को भी विचलित कर देते है।
जेम्श खाका की मां बिसपस्वामी को ईश्वर तुल्य मानती है और चाहती है कि उसकी आने वाली पीढ़ी भी अपना सर्वस्व चर्च को समर्पित कर देवे। ऐसी परिस्थिति में जेम्श खाका का अपना वजुद धुंधला लगने लगता है। वह आत्मग्लानी से भर उठता है कि उसकी जिंदगी पर अपना कोई अधिकार नही है किस हद तक वह चर्च के एहसास तले दबे है। धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियों बनती शुरू हो जाती है जिससे आदित्य पाल और जेम्श खाका को बिसपस्वामी ईसाई मिशनरी की हकीकत का ज्ञान हो जाता है कि स्थिति जैसी भी हो ईसाई मिशनरी वहां की राजनीति पर दखल नहीं देगी व क्षेत्रिय राजनीति भी एक हद तक ही धर्मान्तरण व मिशनरी पर बोलेंगे जो मानवता और संवेदना की बात बिसपस्वामी करते है वो गैर ईसाईयों की तड़प के सामने मूक क्यों हो जाते है।
इसमें जेम्श खाका और आदित्य पाल को गरीबी, रूढ़िवादिता, भूखमरी, दलित विमर्श से बढ़ी ही करीबी से जुझते दिखाता गया है। जिसमें जेम्श खाका द्वारा बिसपस्वामी से किया गया प्रश्न ना जाने कितनी तकलीफ को उजागर कर देता है कि बिसप भूख हमेशा दलित या आदिवासी की ही क्यों होती है। यह कथन अकाट्य सत्य है कि सरगुजा अंबिकापुर, जशपुर, कोरिया अंचल में भूख से मृत्यु की जो घटना पायी गयी है उसमें दलित व आदिवासी ही प्रभावित पाए गए है।
धर्मान्तरण की घटना भी आदिवासियों की उरांव जनजाति के लोगों में ज्यादा संख्या में पायी गयी है और उरांव जनजाति के लोग ही भूखमरी से ज्यादा प्रभावित हुए है। ये सभी घटनांए आपस में एक दूसरी से जुड़ी हुई है जिससे यह ज्ञात होता है कि धर्मान्तरण के पीछे का उद्देश्य उरांव जनजाति के लोगों में केवल भूख सें उभरना, अपने जीवन स्तर, शिक्षा, मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति है जिसे ईसाई मिशनरी उपलब्ध कराती है। जेम्श खाका के द्वारा भूख के परिपेक्ष्य में कहा गया कथन सब कुछ कह देता है। ‘‘भूख का कोई धर्म नहीं होता‘‘
छत्तीसगढ़ का यह अंचल शुरू से ही उपेक्षा गरीबी भुखमरी अशिक्षा, बदहाली से घिरा हुआ है, अशिक्षा की वजह से लोग भयानक रूढ़ियों से जकड़े हुए है, ये रूढ़ियां जिसे वहां के लोग परंपरा मानते है इतने भयानक व दर्दनांक है कि किसी भी विचलित कर दे। ‘‘कालापादरी‘‘ के एक दृश्य है जिसमें एक आदमी छः दिन से भूखा है, उस भूखे व्यक्ति को गांव के चैराहे में लिटा दिया जाता है यह कहकर कि उस पर प्रेतात्मा का साया है और बैगा के द्वारा उसके शरीर पर अमानवीय यातनाएं दी जाती है। गांव के लोगो का विश्वास है और वह व्यक्ति उठ गया तो प्रेतात्मा से मुक्त हो जाएगा अन्यथा ना उठने पर वह पापी कहलाएगा इस पर आदित्य पाल द्वारा जेम्श खाका को किया गया प्रश्न पाठकों को स्तम्ब कर देना है कि भूख क्या प्रेत होती है कथानक से ज्ञात होता है कि काला पादरी समकालीन जीवन का समग्र चित्र है जिसे देखकर भविष्य में आने वाले युग का प्रतिबिंब लोगों की कल्पना से सहज ही उभरता है। तेजिंदर ने अपनी इस अद्भुत कृति में युग परिवेश में मनुष्य की स्थिति सामाजिक तथा सामाजवादी चिंतन के साथ राजनैतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक संदर्भो में स्थिति की खोज करने का सार्थक प्रयास किया है। आज का दौर नव आधुनिकता का है सभी क्षेत्रों मे तेजी से विकास हुआ है चाहे गांव, नगर, महानगर, जंगल, कस्बे ही क्यों ना हो यांत्रिकता ने हर जगह अपना पैर पसार रखा है पर क्या ये सभी सुविधाए किसी वर्ग विशेष के लिए नही है, कालापादरी में भी सही क्षेत्र शेाध संबंधी आशय व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। सरगुजा, अंबिकापुर, कोरिया चिरमिरी, कुनकुरी, बागीचा, जशपुर क्षेत्र का अनुभव संवेदन को काला पादरी ने अपने में समेटा है। उपन्यास में आदर्श के साथ यथार्थ का निर्माण हुआ है। समस्याओं को कालापादरी में इतनी सुक्ष्मता से पकड़ा है जिसमें धर्मान्तरण जैसा विवादित मुद्दा सहजता से प्रस्तुत हो गया है बिना किसी विरोध व आलोचना के।
तेजिंदर को समस्याओं का इतना अधिक ज्ञान है जितना कोई समाजशास्त्री को भी ना हो। क्यो तेजिंदर से पहले अंचल की इतनी भयावह समस्या अन्य किसी के मन मष्तिस्क में नहीं आ पायी, इसमें रचनाकार की सृजनात्मकता और संवेदनात्मकता शामिल है जिसकी वजह से इस अंचल के आदिवासी जनजातियों की परिस्थिति समस्या इतनी सूक्ष्मता से उभर कर आयी है। प्रारम्भ मे ‘‘कालापादरी’’ में सीमित सामाजिक परिवेश के चित्रण का उद्देश्य था जो धीरे-धीरे राष्ट्रीय प्रश्नों को स्पर्श करने लगी, क्योकि आज शोशण, अशिक्षा, धर्मान्तरण, दलित विमर्श, गरीबी क्षेत्रिय नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर की समस्या बन चुकी है। इसलिए ‘‘कालापादरी’’ को वर्तमान समय का जीवत और प्रमाणिक उपन्यास माना गया है। इस उपन्यास ने छत्तीसगढ़ के इस अंचल की सभी पहलुओं परिस्थितियों भावनाओं को जीवंतता और प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत किया है सुप्रसिद्ध लेखक एवं संपादक बी.के. अब्दुल जलील ने स्पष्ट किया है कि आज का समकालीन युग संक्रान्तिकाल सा लगता है क्योकि सामाजिक जीवन में जो कहता है, अशांति और संघर्ष है वे एक नए युग की प्रसव पीड़ा के रूप में निश्चित रूप से कहा नहीं जा सकता। इसमें लेखक ने ‘‘कालापादरी’’ के माध्यम से दलित की एक नही परिभाषा वहां की स्थिति के अनुसार देने की कोशिश की है।
जिसे सदियों से लगातार दबाया गया हो या कुचला गया हो जिसे सपने देखने की मनाही हो वह दलित है। ‘‘कालापादरी’’ भी दलित विमर्श को सच्चाई के साथ प्रकट करता है क्योंकि आज के दौर में दलित लेखन को भी एक नई पहचान मिली है। इसमें एक कठोर वास्तविकता यह भी प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है कि एक अश्वेत पादरी जो कि ईसाई धर्म में समान प्रतिष्ठा, सम्मान का अधिकारी होने के पश्चात् अधर्मान्तिरित गोरे पादरी सी प्रभुता व सम्मान पाने में क्यों वंचित रहा जाता है।
सामान्यतः पादरियों से सांसारिक मोह और आशक्तियों से मुक्त रहने की अपेक्षा की जाती है परन्तु उसके अंदर भी मानव ह्रदय होता है। बड़ी ही कुशलता से रचनाकार ने नायक जेम्श खाका की अंर्तद्वंद की संवेदना व भाव को कलात्मकता से चित्रित किया है।
प्रसिद्ध समीक्षक एवं रचनाकार डाॅ. पारूकांत देसाई ने इस संदर्भ में कहा है कि ‘‘आर्थिक असमान्ता के मार्ग में सामाजिक रूढ़िया और विसंगतियंा अवरोधक होती है‘‘ यहंा तेजिंदर ने अपने उपन्यास मेे सशक्त पात्रों के द्वारा एक आदर्श की प्रतिष्ठा की तो वहीं उस अंचल की क्षेत्रिय समस्या व यर्थाथपरक घटनाओं को कुशल चित्रण किया है। इसके लिए तेजिंदर ने स्वयं उस क्षेत्र के तपन को महसूस किया है। तेजिंदर ने घटनाओं और समस्याओं को ना केवल जिम्मेदारीद से प्रस्तुत किया है अपितु अपने पाठकों के ह्रदय में एक दायित्व बोध उत्पन्न किया है। और संदेश दिया है कि किस तरह मानवीय मुल्यों को क्षरण हो रहा है। मानवीय मुल्यों की पुर्नस्थापना हो सके इसकी सकारात्मक प्रयास रचनाकार ने की है।
अंततः कहा जा सकता है कि कालापादरी में समाज के यथार्थ धड़कन हुई है। तेजिंदर ने उपन्यास के माध्यम से सरगुजा अंचल के जीवन व्यक्ति परिवार समाज का युगीन यथार्थ प्रस्तुत किया है व समकालीन उपन्यास जगत को एक नवीन दिशा देने का भरसक प्रयास किया है।
तेजिंदर ने प्रस्तुत अंचल के विधिक पक्षों को जितनी सहजता, स्पष्टता से उपन्यास में अभिव्यक्त किया है जिसने ‘‘कालापादरी‘‘ को जीवंतता प्रदान की है और निःसंदेश यह उपन्यास साहित्य जगत में जीवंत दस्तावेज के रूप में सुरक्षित रहेगा।
संदर्भ ग्रंथ
1. तेजिंदर, कालापादरी ,नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली 2000,पृष्ठ 26
2. तेजिंदर कालापादरी, नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली 2000, पृष्ठ 55
3. तेजिंदर कालापादरी, नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली 2000, पृष्ठ 131
4. तेजिंदर का कालापादरी, नेशनल पब्लिसिंग हाउस, नई दिल्ली 2000, पृष्ठ 47
5. जलील बी.के. अब्दुल, स्वतंत्रोत्तर हिंदी उपन्यास, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2000 पृष्ठ 77
6. देसाई पारूकांत, हिंदी उपन्यास की विकास परम्परा में साठोत्तरी उपन्यास, चिंतन प्रकाशन कानपुर 2002 पृष्ठ 118
Received on 08.10.2016 Modified on 11.11.2016
Accepted on 16.12.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 233-236.